मैं लिखता हूँ…
मैं लिखता हूँ…
इसलिए नहीं कि कोई पढ़े,
न ही इसलिए कि कोई मेरे अल्फ़ाज़ समझे।
बस कुछ दर्द ऐसे होते हैं,
जो आँखों से बह नहीं पाते,
और कुछ ख़ामोशियाँ ऐसी…
जिन्हें होंठों तक लाना मुमकिन नहीं होता।
इसलिए अपने भीतर उमड़ते
जज़्बातों के समंदर को
काग़ज़ के किनारे लगाने बैठ जाता हूँ।
हर लफ़्ज़ के पीछे एक दर्द होता है,
हर स्याही की बूँद में कोई ख़ामोशी…
और हर अधूरी कहानी में
कुछ ऐसा छुपा होता है,
जिसे शायद मैं ख़ुद भी
कभी लफ़्ज़ों में कह नहीं सका।
लोग इसे शायरी समझते हैं…
मैं तो बस अपने बिखरे हुए वजूद को
काग़ज़ पर समेटता हूँ।
किसी ने पढ़ लिया तो अच्छा…
न पढ़ा तो भी कोई शिकायत नहीं।
क्योंकि ये अल्फ़ाज़
दुनिया के लिए नहीं,
मेरे अंदर दफ़्न उस शोर के लिए हैं,
जो ख़ामोश होकर भी
हर रोज़ मुझे सुनाई देता है।
एक विचार, एक संवाद
— उजास एकनाथ महाजन
०६ सप्टेंबर २०२६


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