मैं की मंडी…
ना जाने कितने लोग खड़े हैं,
अपने-अपने ‘मैं’ का बाज़ार लगाए मंडी में।
कोई चिल्ला-चिल्लाकर
अपना मोल बता रहा है,
कोई ख़ामोश बैठा
दूसरों की क़ीमत आँक रहा है।
ग़ज़ब का ये ‘मैं’ का व्यापार है,
जनाब, माल सबका एक जैसा,
मगर बोली अलग-अलग लगती है।
किसी को अपने होने का गुरूर,
किसी को अपनी क़ीमत का घमंड,
और किसी को लगता है,
उससे महँगा यहाँ कोई है ही नहीं।
अजीब मंडी है साहिब,
यहाँ हर कोई ख़रीदार भी है,
और बिकने को तैयार भी।
फिर भी
ख़रीदारों की भीड़ कम है मंडी में, जनाब…
हर कोई अपना मोल लगाए बैठा है,
मगर ख़रीदने की औक़ात
किसी के पास नहीं।
एक विचार, एक संवाद
— उजास एकनाथ महाजन
१२ सप्टेंबर २०२६


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