ख़ामोश जाम में ठहरा समंदर…
जिस जाम को ख़ुद ये कहना पड़े,
“अभी मैं छलका नहीं…”
यक़ीन मानिए साहिब,
वो जाम अभी भरा नहीं।
भरे हुए जाम को
अपने भरे होने का शोर नहीं करना पड़ता।
वो ख़ामोश रहता है…
और उसकी ख़ामोशी ही उसकी गहराई है।
जो ख़ुद में गहरा हो,
वो अपनी गहराई का हिसाब नहीं देता,
और जो सच में भरा हो,
उसे छलकने की फ़िक्र नहीं होती।
बस वक़्त की एक नज़र काफ़ी है,
फिर वही जाम छलकेगा,
जिसे आज लोग ख़ाली समझ रहे हैं,
उसकी एक बूँद ही काफ़ी होगी,
समंदर बताने को।
क्योंकि साहिब…
हर ख़ामोश जाम ख़ाली नहीं होता,
कुछ जामों में
समंदर ठहरा होता है।
एक विचार, एक संवाद
— उजास एकनाथ महाजन
११ सप्टेंबर २०२६


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